जीवन में कुछ ऐसी घटनाये घटती है जिसे आदमी भूल नही पाता है, भले ही वो घटना सुखद या दुःखद ही क्यो न हो। ये घटनाये हमारी अनुभूतियो को भी प्रभावित करती है और ये अनुभूतियां यादो में कैद हो जाती हैं। और ये यादे दस्तक दे कर कभी-कभी मन के झरोखो से निकल कर बार-बार जीवन्त करती रहती है। और आज मैं उसी जीवंत तस्वीर को रखने का प्रयास कर रहा हूं।
लगभग बीस वर्ष से भी अधिक पुरानी यह घटना है लेकिन आज भी उतनी ही ताजी है। मैं पटना सिटी स्थित अपने ससुराल से अपना घर चिरैयांटाड़ के लिये गंगा ब्रिज के नीचे के रास्ते से अपनी पत्नी तथा दो छोटे बच्चो के साथ स्कुटर से लौट रहा था। चह रास्ता काफी सुनसान रहा करता था परंतु शार्टकट के चक्कर में रात के दस बजने के बावजूद भी घुस आया था। जाड़ा का दिन था और सड़के भी ज्यादा सुनसान थी। सुनसान सड़को पर मैं सक्टर दौड़ाये जा रहा था कि अचानक स्कुटर बंद हो गया। थोड़ी देर के जाच-पड़ताल के बाद पाया कि स्कुटर का पेट्रौल रिजर्व होने के बाद के समाप्ति का है। आप ससुराल गये हो और फिर छोटा साला हो तो उसका भी अपने जीजा के स्कुटर पर पूरा अधिकार तो बनता ही है और वहां से निकलते समय प्रतिक्षा करा कर ही वह मेंरे हवाले स्कूटर को किया था। जाने समय ही उसमें पेट्रोल भराया था इसलिये इस पर निकलते समय ध्यान देना भी मैं उचित नही समझा. फिर देरी हो गयी थी और जल्दबाजी भी थी। लेकिन ऐसे संकट आ जाने पर उसपर क्रोध भी बहुत आ रहा था और गालियां भी निकल रही थी, परंतु पत्नी चूप थी क्योकि पत्नी को पता था कि ज्यादा असभ्य गाली मैं मुंह से नही निकाल पाता हूं और जो निकाल पा रहा था वह रिश्ते को ही इंगित करता था। पतुनी थोड़ा उसका पक्ष और थोड़ा मेंरा पक्ष रख कर सबकुछ बैलेंस रख रही थी। इतने सन्नाटे रास्ते में डर लगना स्वाभाविक है। फिर पेट्रोल पम्प भी वहां से दो किलोमीटर से अधिक दूर था। भयभीत कदमो से हमलोग रास्ता तय करते बढ़ रहे थे। कभी-कभी एकाद गाड़ियां तेजी से सरपट गुजर जा रही थी। भय और मदद- दोनों के बीच से गुजर रहे थे। अचानक एक ट्रक भी गुजरा, फिर आगे जा कर रुक गया। अब भय तेजी से अंदर हमला करने लगा। आदमी का स्वभाव ही है कि वह ज्यादा खराब ही सोचता है और भय के क्षण में तो और भी ज्यादा। पीछे लौटने का भी विकल्प मैं खो चुका था। पत्नी का ज्ञान उपदेश भी ऐसे समय ज्यादा चालू था। पुरुष का स्वाभाव है कि यदि वह वाकई में डरता भी है तो औरत के सामने इसे प्रकट नही कर पाता है, मैं भी कोई अपवाद नही था। अंदर से डर भी था पर बाहर से पत्नी को अपने साहसी होने का हनुमान चालीसा की तरह बखान भी किये जा रहा था। जब आपके पास सारे विकल्प खो जाते हैं तो अपने-आप हिम्मत का विकल्प अचानक आ जाता है। ऐसा ही मैं भी अपने को तैयार कर लिया था। सड़के पूरी तरह से सूनी थी और योद्धा की तरह हम लोग आगे बढे़ जा रहे थे। देखा सामने दे व्यक्ति गाड़ी को रोके खड़े थे।
उनमें से एक ने पूछा -- भैया, क्या आपकी गाड़ी में पेट्रौल खत्म है ?
हां भाई, पेट्रौल नहीं है । -- ऐसा कह कर बिना रुके बढ़ने लगे। अविश्वास और आशंका दोनो का मैं इस
समय कैदी था ।
उसने फिर कहा -- भैया, जरा ठहर जाईये, यहां से पेट्रौल पम्प बहुत दूर है, फिर आपके साथ परिवार
दो-दो बच्चा भी है, मैं पेट्रौल आपको देता हूं। -- और उसने बिना मेंरी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किये पीछे
बंधी बाल्टी निकाला और बाल्टी भर पेट्रौल मेंरे स्कुटर में भर दिया।
घबराहट में मैं यह भी नही देख पाया था कि यह पेट्रौल टैंक वाली गाड़ी थी।
मैं तो उसके इस ऐहसान से बिल्कुल दब सा गया था, कीमत से इसे चूका भी नही पा सकता था, फिर भी
कहा-- मेंरे भाई, आपके इस ऐहसान को मैं चुका नही सकता, फिर भी मेंरी आत्मा की संतुष्टि के लिये
थोड़ा-सा यह रुपया मेंरे तरफ से रख ले, अपने बच्चो को मेंरी तरफ से मिठाई खरीद कर दे देंगे, और
मैं उसकी जेब मे रुपया डालने लगा। लेकिन लाख तर्क के बावजूद भी वह रुपया नही लिया और गाड़ी में
बैठ कर चला गया। मैं आज उसे भले ही चेहरे से नही पहचान पाऊंगा लेकिन उसने मेंरे मन में एक अमिट छाप छोड़ दी है जो मेंरे साथ अब भी हर समय साथ रहता है और मेंरे दिल और दिमाग दोनो को इस नये पूजा की विधि से मुझे प्रेरित करता रहता है। बिना स्वार्थ का सेवा -- । भगवान भी हमें बहुत देता है और हम उसकी इच्छा जाने बगैर चढ़ावा चढा़ कर उसके दान को हल्का नहीं कर दे रहे हैं... क्या दान दे कर हम उसे नही भूल जा रहे है ......, ठीक उसी तरह यदि वह ट्रक ड्राईवर कुछ कीमत ले लेता तो शायद हम आज भी उसे याद नहीं रख पाते....., निःस्वार्थ सेवा ही ईश्बर है जिसे चाह कर भी भुलाया नही जा सकता। फिर हम क्यो भटक रहे है, क्या भगवान इतना छोटा है कि बदले में कुछ पाने की उसकी भी कोई आकांक्षा है।
लगभग बीस वर्ष से भी अधिक पुरानी यह घटना है लेकिन आज भी उतनी ही ताजी है। मैं पटना सिटी स्थित अपने ससुराल से अपना घर चिरैयांटाड़ के लिये गंगा ब्रिज के नीचे के रास्ते से अपनी पत्नी तथा दो छोटे बच्चो के साथ स्कुटर से लौट रहा था। चह रास्ता काफी सुनसान रहा करता था परंतु शार्टकट के चक्कर में रात के दस बजने के बावजूद भी घुस आया था। जाड़ा का दिन था और सड़के भी ज्यादा सुनसान थी। सुनसान सड़को पर मैं सक्टर दौड़ाये जा रहा था कि अचानक स्कुटर बंद हो गया। थोड़ी देर के जाच-पड़ताल के बाद पाया कि स्कुटर का पेट्रौल रिजर्व होने के बाद के समाप्ति का है। आप ससुराल गये हो और फिर छोटा साला हो तो उसका भी अपने जीजा के स्कुटर पर पूरा अधिकार तो बनता ही है और वहां से निकलते समय प्रतिक्षा करा कर ही वह मेंरे हवाले स्कूटर को किया था। जाने समय ही उसमें पेट्रोल भराया था इसलिये इस पर निकलते समय ध्यान देना भी मैं उचित नही समझा. फिर देरी हो गयी थी और जल्दबाजी भी थी। लेकिन ऐसे संकट आ जाने पर उसपर क्रोध भी बहुत आ रहा था और गालियां भी निकल रही थी, परंतु पत्नी चूप थी क्योकि पत्नी को पता था कि ज्यादा असभ्य गाली मैं मुंह से नही निकाल पाता हूं और जो निकाल पा रहा था वह रिश्ते को ही इंगित करता था। पतुनी थोड़ा उसका पक्ष और थोड़ा मेंरा पक्ष रख कर सबकुछ बैलेंस रख रही थी। इतने सन्नाटे रास्ते में डर लगना स्वाभाविक है। फिर पेट्रोल पम्प भी वहां से दो किलोमीटर से अधिक दूर था। भयभीत कदमो से हमलोग रास्ता तय करते बढ़ रहे थे। कभी-कभी एकाद गाड़ियां तेजी से सरपट गुजर जा रही थी। भय और मदद- दोनों के बीच से गुजर रहे थे। अचानक एक ट्रक भी गुजरा, फिर आगे जा कर रुक गया। अब भय तेजी से अंदर हमला करने लगा। आदमी का स्वभाव ही है कि वह ज्यादा खराब ही सोचता है और भय के क्षण में तो और भी ज्यादा। पीछे लौटने का भी विकल्प मैं खो चुका था। पत्नी का ज्ञान उपदेश भी ऐसे समय ज्यादा चालू था। पुरुष का स्वाभाव है कि यदि वह वाकई में डरता भी है तो औरत के सामने इसे प्रकट नही कर पाता है, मैं भी कोई अपवाद नही था। अंदर से डर भी था पर बाहर से पत्नी को अपने साहसी होने का हनुमान चालीसा की तरह बखान भी किये जा रहा था। जब आपके पास सारे विकल्प खो जाते हैं तो अपने-आप हिम्मत का विकल्प अचानक आ जाता है। ऐसा ही मैं भी अपने को तैयार कर लिया था। सड़के पूरी तरह से सूनी थी और योद्धा की तरह हम लोग आगे बढे़ जा रहे थे। देखा सामने दे व्यक्ति गाड़ी को रोके खड़े थे।
उनमें से एक ने पूछा -- भैया, क्या आपकी गाड़ी में पेट्रौल खत्म है ?
हां भाई, पेट्रौल नहीं है । -- ऐसा कह कर बिना रुके बढ़ने लगे। अविश्वास और आशंका दोनो का मैं इस
समय कैदी था ।
उसने फिर कहा -- भैया, जरा ठहर जाईये, यहां से पेट्रौल पम्प बहुत दूर है, फिर आपके साथ परिवार
दो-दो बच्चा भी है, मैं पेट्रौल आपको देता हूं। -- और उसने बिना मेंरी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किये पीछे
बंधी बाल्टी निकाला और बाल्टी भर पेट्रौल मेंरे स्कुटर में भर दिया।
घबराहट में मैं यह भी नही देख पाया था कि यह पेट्रौल टैंक वाली गाड़ी थी।
मैं तो उसके इस ऐहसान से बिल्कुल दब सा गया था, कीमत से इसे चूका भी नही पा सकता था, फिर भी
कहा-- मेंरे भाई, आपके इस ऐहसान को मैं चुका नही सकता, फिर भी मेंरी आत्मा की संतुष्टि के लिये
थोड़ा-सा यह रुपया मेंरे तरफ से रख ले, अपने बच्चो को मेंरी तरफ से मिठाई खरीद कर दे देंगे, और
मैं उसकी जेब मे रुपया डालने लगा। लेकिन लाख तर्क के बावजूद भी वह रुपया नही लिया और गाड़ी में
बैठ कर चला गया। मैं आज उसे भले ही चेहरे से नही पहचान पाऊंगा लेकिन उसने मेंरे मन में एक अमिट छाप छोड़ दी है जो मेंरे साथ अब भी हर समय साथ रहता है और मेंरे दिल और दिमाग दोनो को इस नये पूजा की विधि से मुझे प्रेरित करता रहता है। बिना स्वार्थ का सेवा -- । भगवान भी हमें बहुत देता है और हम उसकी इच्छा जाने बगैर चढ़ावा चढा़ कर उसके दान को हल्का नहीं कर दे रहे हैं... क्या दान दे कर हम उसे नही भूल जा रहे है ......, ठीक उसी तरह यदि वह ट्रक ड्राईवर कुछ कीमत ले लेता तो शायद हम आज भी उसे याद नहीं रख पाते....., निःस्वार्थ सेवा ही ईश्बर है जिसे चाह कर भी भुलाया नही जा सकता। फिर हम क्यो भटक रहे है, क्या भगवान इतना छोटा है कि बदले में कुछ पाने की उसकी भी कोई आकांक्षा है।
विवरण भले ही मार्मिक हो किन्तु संदेश सटीक और स्पष्ट है कि,'निस्वार्थ मानव सेवा ही वास्तविक पूजा है'।
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